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| INACS 2009 - हिन्दी | | Print | |
| Written by Web Admin |
| Sunday, 11 October 2009 01:45 |
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''हिन्दी नवजागरण की विचारधारा'' पर शोध-पत्र आमंत्रित है। हिन्दी नवजागरण हिन्दी भाषा, साहित्य और हिन्दी जनता का अतीत नहीं है बल्कि वह हमारे आज के समय में सतत वर्तमान है। हमारा आज का समय और समाज उस ऐतिहासिक परिघटना की उपज है जो हिन्दी क्षेत्र में १८५७ के महान संघर्ष के ठीक बाद शुरू हुआ। यह नवजागरण शेष भारत के नवजागरण से भिन्न प्रकृति का है। यह भिन्नता इसके सामाजिक- आर्थिक आधार और अधिरचना दोनों ही स्तरों पर थी।शेष भारत में विशेषकर औपनिवेशिक प्रान्तों में समाज सुधार की चेतना १९ वीं सदी के पूर्वार्ध में विकसित हुई और आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लिया। लेकिन समाजसुधार की गहरी चेतना से संपन्न होने के बावजूद औपनिवेशिक प्रान्तों के नवजागरण के नायक १८५७ में भारतीय जनता के संघर्ष को समझ नहीं सके और प्रायः उससे उदासीन रहे। जबकि हिन्दी नवजागरण ने उभर रहे राष्ट्रीय आन्दोलन की वह क्रान्तिकारी धरातल तैयार की जिस पर २०वीं सदी में दुनिया का एक महान जनान्दोलन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ।हिन्दी नवजागरण के साथ मुस्लिम अलगाववाद भी समानान्तर ही चल रहा था। हिन्दी नवजारण ने आधुनिक भारत को उसकी राष्ट्र भाषा दी जिसे स्वतन्त्रता के आन्दोलन को ताकत मिली और मुस्लिम अलगाववाद ने सांप्रदायिकता को जन्म दिया जिसका परिणाम पाकिस्तान और बांग्लादेश के रूप में सामने आया। वस्तुतः नवजागरण का मुख्य द्वंद्व हिन्दी उर्दू- विवाद, देश मुक्ति व समाज मुक्ति तथा देश भक्ति और राजभक्ति के बीच है जो आधुनिक भारत के औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया और औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के प्रयत्नों के बीच चल रहा था । भारत में स्थानीय निकायों की स्थापना के रूप में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जन्म हुआ और विश्वविद्यालयों की स्थापना भी हुई। इसी के साथ हम हिन्दू – मुस्लिम दंगों की व्यवस्थित शुरुआत भी देखते हैं। है। इन सब पर अलग – अलग ढंग से अध्ययन हुए हैं लेकिन समूचे हिन्दी नवजागरण की विचार धारा का समुचित अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है। नवजागरण की विचारधारा के विकास का अध्ययन हमें सोचने पर विवश भी करता है कि विचारधारा का सरलीकरण और उसकी नकारात्मक चीजों पर ध्यान न देना कितना खतरनाक हो सकता है, यह हम अपने नवजागरण से सीख सकते हैं। भारत का विभाजन इसी असावधानी का परिणाम कहा जा सकता है। पाकिस्तान बनने के इतने वर्षों के बाद भी भारत में हिन्दू - मुस्लिम संबंध सहज नहीं हो पाये हैं। इस लिये भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आधुनिक भारत विशेषकर उत्तर भारत में हिन्दू – मुस्लिम समाज की विचारधारा को समझा जा सकेगा। (सत्र अध्यक्ष - डॉ विवेकानंद उपाध्याय, अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडियन स्टडीज, जयपुर, राजस्थान)
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| Last Updated on Wednesday, 28 October 2009 02:44 |
