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| शोध-पत्र आमंत्रण - हिंदी नवजागरण | | Print | |
| Written by डॉ. विवेकानंद उपाध्याय |
| Thursday, 29 October 2009 14:42 |
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शोध-पत्र आमंत्रण “हिन्दी नवजागरण की विचारधारा” साहित्यकार, इतिहासकार, समाजशास्त्री, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अन्य विद्वतजनों से ''हिन्दी नवजागरण की विचारधारा'' पर शोध-पत्र आमंत्रित है।
पृष्ठभूमि इतिहास केवल अतीत की चीज नहीं जो समय के साथ लुप्त हो जाय। वह अपनी शक्ति को भविष्य की प्रक्रिया के भीतर पर्यवसित कर सदा अपने आपको जीवित रखता है। इसलिए इतिहास का अध्ययन इतिहास का अतीतोन्मुखी अध्ययन नहीं होता। वस्तुतः वह वर्तमान की सतह के नीचे की वस्तुगत सच्चाई का अध्ययन होता है जो हमें भविष्य की संभावनाओं को ठीक से समझने मे सहायता देता है। यही इतिहास के अध्ययन की प्रासंगिकता और उपादेयता है। हिन्दी नवजागरण के इतिहास के अध्ययन का मूल उद्देश्य भी यहीं से स्पष्ट होता है। हिन्दी नवजागरण हिन्दी भाषा, साहित्य और हिन्दी जनता का अतीत नहीं है बल्कि वह हमारे आज के समय में सतत् वर्तमान है। हमारा आज का समय और समाज उस ऐतिहासिक परिघटना की की उपज है जो हिन्दी क्षेत्र में १८५७ के महान संघर्ष के ठीक बाद आरंभ हुआ।यह नवजागरण शेष भारत के नवजागरण से भिन्न प्रकृति का है। यह भिन्नता इसके सामाजिक आर्थिक आधार और अधिरचना दोनों ही स्तरों पर थी। शेष भारत में विशेषकर औपनिवेशिक राज्यों में समाज सुधार की चेतना १९ वीं सदी के पूर्वार्ध में विकसित हुई और आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लिया। लेकिन समाज सुधार की गहरी चेतना से संपन्न होने के बावजूद औपनिवेशिक प्रान्तों के नवजागरण के नायक १८५७ में भारतीय जनता के महान संघर्ष को समझ नहीं सके और प्रायः उससे उदासीन रहे। जबकि हिन्दी नवजागरण ने उभर रहे राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये वह क्रान्तिकारी धरातल तैयार की जिस पर २०वीं सदी में दुनिया का एक महान जनान्दोलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
हिन्दी नवजागरण के साथ-साथ मुस्लिम प्रिथकतावादी आन्दोलन भी समानान्तर ही चल रहा था। हिन्दी नवजागरण ने आधुनिक भारत को उसकी राष्ट्रभाषा दी जिसे स्वतंत्रता के आन्दोलन को शक्ति मिली और मुस्लिम अलगाववाद ने सांप्रदायिकता को जन्म दिया जिसका परिणाम पाकिस्तान और बांग्लादेश के रूप में सामने आया।
आखिर क्या कारण है कि उत्तर भारत की खड़ी बोली जो पहले लगभग उपेक्षित रही थी आधुनिक भारत के नवजागरण, आजादी के आन्दोलन और स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा बन गयी? इतिहास के भीतर उन शक्तियों की पहचान और उनका विश्लेषण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। हिन्दी नवजागरण की पाँच प्रमुख भुजाएँ हैं। इनमें से दो हैं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द जिनके बीच हिन्दी के स्वरूप को लेकर गहरा विवाद था लेकिन हिन्दी की पत्र-पत्रिकाँए निकालने से लेकर स्कूल चलाने और पाठ्य पुस्तकें तैयार करने तक इन सबमें दोनों ने आगे बढ़कर काम किया। दोनों की कार्यपद्धति में एक महत्वपूर्ण अंतर यह था कि राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के प्रयास जहाँ व्यक्तिगत स्तर के थे वहीं भारतेन्दु ने एक समूह के नेता की तरह न केवल स्वयं लिखा बल्कि दूसरों को भी लिखने के लिए प्रेरित किया और उनका मार्गदर्शन और नेतृत्व किया। भारतेन्दु का यह कार्य इतिहास की सोयी हुई शक्तियों को जगाने जैसा था। इसके समानान्तर स्वामी दयानन्द सरस्वती हिन्दू समाज के सुधार का प्रयत्न कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर सर सैय्य्द अहमद खां मुस्लिम समाज मे इस्लाम को पुनर्भासित कर मुसलमानों कि एक अलग पह्चान बनाने को प्रयासरत थे। इनको नवजागरण की तीसरी और चौथी भुजा कहा जा सकता है। देश सुधार और समाज सुधार के कोलाहल से दूर देवकी नन्दन खत्री अपने तिलिस्मी–ऐयारी उपन्यासों से आम जनता का मनोरंजन कर रहे थे । यही हिन्दी नवजागरण की पाँचवीं भुजा है क्योंकि यह मनोरंजन विशेष तरह का था। उनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए कई उर्दू भाषी लोगों ने हिन्दी सीखी। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि बदलाव की बयार के दौर में अवास्तविक समय और समाज में जनता का इस तरह डूबना आश्चर्यचकित करने वाला है। क्या नवजागरण के समय और समाज का देवकी नंदन खत्री के उपन्यासों से कोई गहरा संबंध था या समाज की सतह के नीचे की प्रतिगामी शक्तियों का असर। अभी तक हिन्दी मे नवजागरण और इनके अंतःसंबंधों का अध्ययन और विश्लेषण नहीं हुआ है। यह प्रस्तुत बिषय का एक पक्ष मात्र है।
वस्तुतः नवजागरण का मुख्य द्वंद्व हिन्दी-उर्दू विवाद, देश-मुक्ति व समाज-मुक्ति तथा देशभक्ति और राजभक्ति के बीच है जो आधुनिक भारत के औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया और औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के प्रयत्नों के बीच चल रहा था । भारत में स्थानीय निकायों की स्थापना के रूप में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जन्म हुआ और विश्वविद्यालयों की स्थापना भी हुई। इसी के साथ हम हिन्दू–मुस्लिम दंगों की व्यवस्थित शुरुआत भी देखते हैं। है। इन सब पर अलग–अलग ढंग से अध्ययन हुए हैं लेकिन समूचे हिन्दी नवजागरण की विचारधारा का समुचित अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है।
आधुनिक समाज में विचारधारा का विकास राजनीतिक ढंग से हुआ। इसके पहले धर्म ही विचारधारा का एक मात्र रूप था। लेकिन आधुनिकता ने धर्म को भी राजनीतिक ढंग से अपने भीतर समेट लिया। धर्म की राजनीति ने ही विकसित और व्यवस्थित होकर सांप्रदायिकता का रूप ले लिया। इसलिए नवजागरण के संदर्भ में विचारधारा का अध्ययन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। चूंकि विचारधारा जीने का एक सही तर्क है। इसलिए इसके अभाव में एक आधुनिक मानव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे राष्ट्रीय नवजागरण ने सबसे पहला कार्य विचारधारा निर्माण के क्षेत्र में ही किया । लगभग ९५ प्रतिशत जनसंख्या के निरक्षर होने के बावजूद पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बड़े पैमाने पर हो रहा था। प्रखर, निर्भीक और स्वतंत्र वैचारिकता का जो विस्फोट हमें उस युग में दिखायी देता है उसका दसांश भी अगर आज होता तो भारतीय समाज में विचारहीनता का जो संकट दिखायी दे रहा है, वह नहीं होता। आज स्कूल और अखबार दोनों ही समाज सेवा के साधन नहीं रहे वे केवल व्यावसायिक उत्पाद भर बनकर रह गये हैं। लेकिन नवजागरण काल में ऐसा नहीं था। इससे यह स्पष्ट है कि आज हम अपने नवजागरण की परंपरा से कितने दूर हैं।
नवजागरण की विचारधारा के विकास का अध्ययन हमें सोचने पर विवश भी करता है कि विचारधारा का सरलीकरण और उसकी नकारात्मक चीजों पर ध्यान न देना कितना खतरनाक हो सकता है, यह हम अपने नवजागरण से सीख सकते हैं। भारत का विभाजन इसी असावधानी का परिणाम कहा जा सकता है।
सरकारी कार्यालयों और न्यायालयों में हिंदी को लागू करने की माँग एक लोकतांत्रिक माँग थी। लेकिन वह मांग सांप्रदायिकता का शिकार हो गयी। हिन्दी की मांग ने हिन्दी–उर्दू विवाद को जन्म दिया जिसके परिणामस्वरूप हिन्दू–मुस्लिम विवाद बढ़ा और अंततः पाकिस्तान बना। पाकिस्तान बनने के इतने वर्षों के बाद भी भारत में हिन्दू-मुस्लिम संबंध सहज नहीं हो पाये हैं। इस लिहाज से भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आधुनिक भारत विशेषकर उत्तर भारत में हिन्दू–मुस्लिम समाज की विचारधारा को समझने में मदद मिलेगी।
अध्ययन के क्षेत्र 1. नवजागरण की विचारधारा का विकास 2. लोकतांत्रिक संस्थाओं का जन्म 3. भारत के औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया और औपनिवेशिक दासता से मुक्ति 4. देवकी नन्दन खत्री, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द 5. नवजागरण का मुख्य द्वंद्व हिन्दी-उर्दू विवाद 6. देश-मुक्ति व समाज-मुक्ति तथा देशभक्ति और राजभक्ति के बीच द्वंद्व
अपना पक्ष रखने के लिए अन्य विषयों के शीर्षक चुन सकते हैं।
दिशा निर्देश माध्यम: प्रस्तुतिकरण और जीवंत बहस के लिए हिन्दी वांछनीय होगा। प्रस्तुतिकरण के लिए हिन्दी स्वीकार्य होगी।
अन्तिम तिथि निवेदन की अंतिम तिथि: प्रतिभागियों से अनुरोध है कि वे अपना संक्षिप्त शोध परिचय आवेदन 25 अक्टूबर, 2009 तक कर दें। पूर्ण शोध पत्र: प्रतिभागियों से अनुरोध है कि वे अपने पूर्ण शोध-पत्र 15 नवंबर 2009 तक जमा कर दें।
निवेदन प्रक्रिया: कहां भेजें: This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it (वाया ई-मेल)
पता: निचला तल, बी-27, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली-110024
पत्रों का चयन: एक चयन समिति ही पत्रों का चयन करेगी। जिन पत्रों को चुना गया उनकी जानकारी कोरियर या ई-मेल द्वारा दी जाएगी। अत: आपसे अनुरोध है कि अपना डाक पता या ई-मेल (इनमें से कोई) देने की कृपा करें।
यात्रा अनुदान: निजी प्रायोजकों के माध्यम से सीमित मात्रा में यात्रा-अनुदान चयन समिति के सलाह पर उपलब्ध होगा। जो छात्र एम.ए. या पीएचडी में शोधरत हैं और कार्यक्रम में भाग लेंगे, उन्हें यात्रा अनुदान में प्राथमिकता दी जाएगी। |
| Last Updated on Wednesday, 04 November 2009 20:08 |

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